शनिवार, 31 अगस्त 2013

अमर शहीद श्री राजीव दीक्षित जी का राष्ट्र के नाम सन्देश


                                          अब श्री राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान ही देश को बचा सकते हैं। मैंने राजीव भाई के 31 व्याख्यानों का संकलन किया है। अगर आप राजीव भाई के ये 31 व्याख्यान (एक महीने तक) सुन लेंगे तो आपको इस देश में क्या षड्यंत्र हो रहे हैं तथा विदेशी ताकतें किस तरह से इस देश को लूट रही हैं, इन सबके बारे में वास्तविकता पता चल जायेगी। कृपया निम्न दी गयी सभी लिंक पे क्लिक करें तथा राजीव भाई के व्याख्यान जरूर सुने। और डाउनलोड करके सभी को सुनाएँ। अब तो इस देश में क्रांति होकर रहेगी। वन्दे मातरम्। 

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1. http://98.130.113.92/Bharat_Ka_Swarnim_Atit.mp3
 2. http://98.130.113.92/Bharat_Ki_Vishwa_Ko_Den.mp3
 3. http://98.130.113.92/Sanskrut_Bhasha_Ki_Vaigyanikta.mp3
 4. http://98.130.113.92/Bharat_Ka_Sanskrutik_Patan.mp3
 5. http://98.130.113.92/Bharat_Mein_Gulaami_Ki_Nishaaniyan.mp3
 6. http://98.130.113.92/Swadeshi_Se_Swawlambi_Bharat.mp3
 7. http://98.130.113.92/Swaasthya_Katha.mp3
 8. http://98.130.113.92/Vyavastha_Parivartan_Ki_Kranti.mp3
 9. http://98.130.113.92/Maut_Ka_Vyapar.mp3
 10.http://98.130.113.92/Swadeshi_Andolan_Mein_Ganesh_Utsav_Ka_Mahatva.mp3
 11. http://98.130.113.92/Videshi_Vigyapano_Ka_Jhoot.mp3
 12. http://98.130.113.92/Macaulay_Shikshan_Paddhati.mp3
 13. http://98.130.113.92/Elizabeth_Ki_Bharat_Yaatra_1997.mp3
 14. http://98.130.113.92/Goraksha_Aur_Uska_Mahatv.mp3
 15. http://98.130.113.92/Vigyapano_Ka_Baal_Mann_Par_Prabhav.mp3
 16. http://98.130.113.92/Patent_Kaanoon_Aur_Davao_Par_Hamla.mp3
 17. http://98.130.113.92/Pratibha_Palaayan_Pune_Engg_College.mp3
 18. http://98.130.113.92/Angrejee_Bhasha_Ki_Gulaami.mp3
 19. http://98.130.113.92/Mansaahaar_Se_Haaniyan.mp3
 20. http://98.130.113.92/Aetihaasik_Bhoolen.mp3
 21. http://98.130.113.92/Antarraashtriya_Sandhiyon_Mein_Phansa_Bharat.mp3
 22. http://98.130.113.92/Udharikaran_Aur_Vaishvikaran.mp3
 23. http://98.130.113.92/Bharat_Aur_Paschimi_Vigyan_Takniki.mp3
 24. http://98.130.113.92/Bharat_Aur_Europe_Ki_Sanskruti.mp3
 25. http://98.130.113.92/Kheti_Aur_Kisaano_Ki_Gulaami.mp3
 26. http://98.130.113.92/Bharatiya_Azaadi_Ka_Itihaas.mp3
 27. http://98.130.113.92/Arthvyavastha_Ko_Sudhaarne_Ke_Upaay.mp3
 28. http://98.130.113.92/Sanskrut_Bhasha_Ki_Vaigyanikta.mp3
 29. http://98.130.113.92/Aatankvaad_Aur_Uska_Nivaaran_WTC_Attack.mp3
 30.http://98.130.113.92/Bharat_Ke_Samajik_Evam_Charitrik_Patan_Ka_Shadyantra.mp3
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                                             बहुत अफसोस औए दुःख से मुझे कहना पड़ता हैं कि इस देश की आजादी के लिए जिन शहीदों ने संघर्ष किया, बलिदान दिया , जिनके जीवन का सब कुछ इस देश के लिए न्यौछावर हो गया , उनके सपनों और आदर्शों का भारत अगर बन जाता तो हमारे जैसे लोगों को इस तरह के काम में नहीं आना पड़ता । हुआ ये है की आजादी के 66 वर्षों के बाद भी हमारे अपने शहीदों के सपनों का भारत बन नहीं पाया है  । शहीदों ने जो सपना देखा था वैसा आदर्श इस देश में स्थापित नहीं हो पाया । अब शहीदों के सपनों का भारत स्थापित करना है और शहीदों के सपनों के आदर्शों को इस देश में स्वतंत्रता रूप में, स्वराज्य रूप में उतारना हैं 15 अगस्त 1947 के बाद तुरंत होना चाहिए था लेकिन वो नहीं हो पाया । मुझे आप से एक बात कहनी है, कि अपनी आजादी बहुत कीमती है। अपनी आजादी का मूल्य अगर आप समझना चाहें तो दो तीन बातें आपसे मैं कहना चाहता हूँ ।

                                         सबसे पहली बात कि दुनियां में 50 से ज्यादा देश, अलग अलग समय पर गुलाम हुए हैं; लेकिन किसी भी देश की आजादी में इतने लोग अपना सब कुछ न्यौछावर करके शहीद नहीं हुए हैं। दुनियां में सबसे ज्यादा शहादत भारत की आजादी के के लिए हुई है । अमर शहीद तांत्या टोपे से अगर शुरुआत की जाये तो वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई, वीरांगना चित्तूर चेन्नमा,वीरांगना झलकारी बाई,वीरांगना दुर्गावती , नाना साहब पेशवा ,सरदार भगत सिंह जैसे शहीदों को मिलाकर यदि सूचि बनायीं जाये तो "सात लाख बत्तीस हज़ार सात सौ अस्सी" नाम इसमें जुड़ जायेंगे। आपको शायद इस बात का अंदाजा है कि नहीं की इस देश की आजादी के लिए "सात लाख बत्तीस हज़ार सात सौ अस्सी" शहीदों की कुर्बानी हुई है।
 और ये "सात लाख बत्तीस हज़ार सात सौ अस्सी" वो शहीद है जिनको अंग्रेजों ने फांसी के फंदे पर चढा दिया था; जैसे कि अमर शहीद तंत्याटोपे जिनको की यंहा शिवपुरी में फांसी चढ़ाई गयी थी । ऐसे ही अन्य शहीदों को भी फांसी पर चढ़ाया गया था । इसके आलावा अंग्रेजो की पुलिस के लाठियों के अत्याचार से,गोली बारी से, उनके खौफनाक तरीकों से लोगों की जाने ली गयी। आपको शायद मालूम हो या नही की बहुत से लोगों को टॉप के मुहँ पर बाँध कर शरीर के चीथड़े करदिये जाते थे । तो जिन शहीदों को तोप के मुंह से बाँधा गया, अंग्रजो की लाठियों के अत्याचार ने मार डाला या दुसरे तरीकोंसे जिनकी जाने ली गयी उनकी संख्या साढ़े चार करोड़ है । दुनिया के किसी देश की इतिहास में लोगो की इतनी बड़ी संख्या आजादी के लिए कुर्बान नहीं हुई । अंग्रेजों की नीतियों ने और अग्रेजों के अत्याचारों ने ऐसे कई बार मंजर उपस्थित किये थे । में आपको बंगाल के कुछ ऐसे उदाहरण देना चाहता हूँ ।
                                                  1857 में जब आजादी की क्रांति हुई तब पहली बार अंग्रेज पराजित हुए और भारत के क्रांतिकारियों की जीत हुई । इसके बाद 1 नवम्बर सन 1858 में अंग्रेजों ने दुबारा हमला किया था और बंगाल के आसपास उन सब इलाको को अंग्रेजो ने सील कर दिया था, जहाँ से क्रांति कारियों के दल निकला करते थे । बंगाल के एक महान क्रन्तिकारी थे अरुविन्दो घोष, विपिन चन्द्र पाल। ऐसे क्रांतिकारियों के दल बल जिन गाँव शहरों में रहा करते थे उन सभी जगहों को सील कर दिया गया था। ऐसे जगह पर खाने पिने की चीजों का मिलना बंद करा दिया था। भोजन समग्री जब महीनों महीनो तक उन जगहों पर नहीं पहुंची तो हजारों, लाखों लोगों ने भूख दे तड़प कर जान देदी । उनकी सख्या इस देश में साढ़े चार करोड़ के आसपास है। बहुत ही बड़ी क़ुरबानी हुई है । हम तो बड़ा अफ़सोस इस चीज का कर सकते है कि अगर हम क्रांतिकारियों की सूचि बनाने बैठे तो 10 -15 लोगों से ज्यादा के नाम याद नहीं आते हें। इस देश अच्छे खासे पढ़े लिखे और विद्वान लोगों के साथ में जब चर्चा करता हूँ और कहता हूँ कि चलो अपने इलाके के शहीदों की एक सूची बनाओ तो दो -चार से ज्यादा नाम ही याद नहीं आते। इतनो बड़ी विडम्मवना हैं, इतना अफ़सोस हैं की जिन लोगों ने हमे ये दिन दिखाया हम उन्हें भूल चुके हैं। हमें न तो उनके नाम,कुल,गोत्र और नहीं गाँव ही हमें मालुम हैं। और शायद इसी अँधा धुंदी में हमें ऐसे भी मंजर देखने को मिलते हैं जो किसी और देश में संभव नहीं हैं। इस देश के शीर्ष स्थानों पर ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने पल-पल इस इस देश के साथ गद्दारी की हैं, इसा देश के समाज से गद्दारी की हैं और इस राष्ट्र की अस्मिता से गद्दारी की है। जिन लोगों ने अपना सब कुछ इस देश के किये कुरबान कर दिए उनके आज की पीढ़ी चाय बेच कर अपने परिवार का गुजर करते कभी हमारी कल्पना नही थी की ऐसा देश बनेगा, शहीदों ने भी अगर ये सोचा होता की ऐसा ही देश बनेगा तो शायद वो भी शहादत नही देते. उन्होने तो ये सोचकर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया की हम नही तो हमारी आने वाली पीडी इस देश में स्वतन्त्रता का मंज़र देखेगी, शहीदों के सपनों और आदर्शों का सम्मान होगा और उनके आदर्शों और सपनों का भारत बनेगा, लेकिन आज़ादी के 66 वर्षों के बाद भी ऐसा नही हो सका. जिस समाज मैं गद्दारों का सम्मान होने लगे, जिस संमाज में विश्वासघातियों को कुर्सियाँ मिलेने लगे, जिस समाज में गद्दारों और विश्वासघातियों को सत्ता शिखर पर पहुँचाने का काम होने लगे और शहीदों के परिवार को चाय बेचकर घर चलाना पड़े. उस देश की क्या दशा होगी, ये आप अपने दिमाग़ से सोचे और तय करें. मुझे तो बहुत खराब लगता हैं, बहुत क्रोध आता है इस देश की व्यवस्था पर. इतना महत्वपुराण इस देश की कुर्वानी का ये आधार और दूसरा आज़ादी मिलते ही इस देश के शहीदों को भूल जाना कैसे संभव हुआ. जिन उद्देश्यों के लिए शहीदों ने शहदात दी उनमे से एक भी उद्देश्य पूरा होता दिखाई नही देता है.

                                          एक पुरानी घटना शुरू करता हूँ मैं अपने व्याख्यान के लिए.अमर शहीद भगत सिंह, अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद, अमर शहीद मनमत नाथ गुप्त, अमर शहीद सचिन्द्र नाथ लहिडी , अमर शहीद राम प्रसाद विस्मिल जैसे लोगों ने मिलकर एक संगठन बनाया था, जिसका नाम था हिन्दुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसियेशन. ये संगठन वाराणसी में बना था सन 1924 में. इस संगठन की स्थापना के समय सारे क्रांतिकारियों ने मिलकर एक घोषणा पात्र जारी किया था, जैसे आज कल राजनैतिक पार्टियों के मैनेफेस्टॉस होते है. ये घोषणा पत्र सभी क्रांतिकारियों के हस्ताक्षर से जारी हुआ था. बहुत दिनो के बाद मेरे जैसे आदमी को ये घोषणा पत्र दिल्ली के अभिलेखागार में ऐसी जगह से मिला, जिसे बताया नही जा सकता. ऐसी सभी सरकारी जगहों पर एक कूडाघर होता है, ऐसे ही कचरा घर में मुझे भारत केक्रांतिकारियों का घोषणा पत्र पड़ा हुआ मिला. ये पत्र हाथ से लिखा गया था, जिसमें सभी क्रांतिकारियों के हस्ताक्षर थे और अमर शहीद भगत सिंह की लिखावट थी. मैं अपने जीवन में क्रांतिकारीओं के द्वारा लिखे हुए पत्र पढता रहा हूँ, इस लिए में भगत सिंह की लिखावट को पहचानता था. कचरे के ढेर से मैने वो पत्र निकाल लिया, पलटने की कोशिश की तो बहुत पुराना होने की वजह से वह फॅट गया. मैने वो पत्र लेजाकर अभिलेखागार के डाइरेक्टर को दिखाया और पूछा कि इतने महतव की चीज़ कूड़े के ढेर में पड़ी हुई है? इसको तो वहूत सुरक्षित स्थान पर होना चाहिए था. तो उस आदमी ने जबाब दिया की राजीव भाई पूरा देश ही कूड़े के ढेर में पड़ा हुआ है, इसका क्या करें. उसके बाद उस पत्र अच्छे से निकाल कर शीशे पर रख कर सेलो टेप लगाकर और फटे हुए हिस्सों को जोड़कर पढने लायक बनाया. वो घोषणा पत्र आज भी दिल्ली में है, उस घोषणा पत्र मैं क्रांतिकारी क्या लिख रहें है.

                                                       अंग्रेज भारत को छोड़ कर जाए ये हमारे जीवन का पहला लक्ष्य है; लेकिन ये आख़िरी नहीं है सिर्फ़ पहला है. जिसका अर्थ है की अँग्रेज़ों के जाने के साथ हमारी लड़ाई शुरू होती है ख़तम नही. अंग्रेज भारत से जाएँ ये पहला लक्ष्य है दूसरालक्ष्य क्या है? दूसरा लक्ष्य उससे भी बड़ा है की अँग्रेजियत भारत को छोड़ कर जाय . अगर आप पूछेंगे अँग्रेजियत का मतलब तो इसका मतलब है अँग्रेज़ों की बनाई हुई व्यवस्था,क़ानून,नीतियाँ और तंत्र . इसको एक शब्द में अँग्रेजियत कहा जाता है. अंगरेज़ों की भाषा,भूषा,भेशज,पाठ्यक्रम, क़ानून व्यवस्थाएँ, न्याय व्यवस्था ,प्रशशणिक व्यवस्था और कर व्यवस्था; ये सारा का सारा तंत्र भारत से चला जाय ये क्रांतिकारियों का दूसरा लक्ष्य था. फिर उस घोषणा पत्र में लिखा गया कि अँग्रेज़ों ने इस देश को लूट लूट कर ग़रीब बना दिया है वरना ये देश कभी ग़रीब नही था. यह ग़रीबी इस देश से मिटे और भारत फिर से एक संपत्तिवान देश वने . भारत के किसान और मजदूरों को इतना सम्मान मिले जितना पिछले 250 वर्षों मैं कभी नही मिला, और जिसके वो हमेसा हकदार थे. हर व्यक्ति मान और सम्मान के साथ जिए जैसे आजकल कोई करोड़ पति और अरब पति जीता है. व्यक्ति का सम्मान हो, उस के कर्म और कर्तव्य का सम्मान हो पैसे का सम्मान न हो क्यों की पैसा का सम्मान किसी व्यवस्था को कायम करने वाला हो नही सकता. इसलिए हम कर्म को आधार बनाकर हम सम्मान करें देश के साधारण नागरिकों का. फिर उस घोषणा पत्र मै शहीदों की तरफ से लिखा गया है कि हमारे हाथ मैं पाँच उंगलियाँ है, हर उंगली दूसरी उंगली के बराबर नही है और दूसरी उंगली से बहुत छोटी या बहुत बड़ी नही है इसलये हर अमीर और ग़रीब में उतना ही मामूली अंतर होना चाहिए जितना हाथ की उंगलियों में है. ये हमारे उद्देश्यों मे शामिल है. इस तरह से उस घोषणा पत्र में 29 विंदु शहीदों ने लिखे थे जो इतिहास है जिस पर इस देश की संसद और विधान सभाओं में वहस होनी चाहिए की हमारे शहीदों के सपने क्या थे; जिसके लिए वो अपने को इस देश के लिए कुर्बान कर गये. अंत में उस घोषणा पत्र में लिखा है की देश के सारे नौज़बानों से ये अपील हैं " हम तो इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जीते ज़ी मर और खप जाएँगे लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के नौजवान इन्ही रास्तों पर आते रहें और देश के लिए अपने को खपाते रहें और न्योछावर करते रहें".

                                                  एक वाक़या शहीदे आज़म भगत सिंह ने लिखा अपने कलम से और वह लिखते हैं कि भारत आज़ाद होगा ; इसे दुनियाँ की कोई ताक़त रोक नहीं सकती. इसके आगे वह लिखते हैं कि भारत आज से लगभग 15 साल बाद आज़ाद होगा; लेकिन आज़ादी के बाद का भारत कैसा होगा इस को लेकर हमारे मन में बहुत आशंकाए और अविश्वाश है. आज़ादी के बाद देश यदि अपने रास्ते पर चलेगा, स्वदेशी और स्वावलंबन के रास्ते पर चलेगा तो हमारी आत्मा को बहुत सकून मिलेगा. लेकिन अगर आज़ादी के बाद यदि ये देश फिर विदेशी और गुलामी के रास्ते पर चल पडा तो हमारी शहादत बेकार जाएगी. इसलये भारतवासियों  से हमें अपील करनी है कि आज़ादी तो आ ही जाएगी, वो बड़ी बात नहीं है. लेकिन आज़ादी के बाद का भारत कैसा बनाया जाएगा वो महत्व की बात है. ऐसा घोषणा पत्र हमारे क्रांतिवीरों अमर शहीद भगत सिंह , अमर शहीद चंद्र शेखर आज़ाद, अमर शहीद मनमत नाथ गुप्त, अमर शहीद सुचिन्द्रा नाथ लहिडी , अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल जैसे और ठाकुर रोशन सिंह ने लिखा था. ये वो क्रांतिकारी थे जो हिंसा के रास्ते पर चलकर भी देश को आज़ादी दिला ना चाहते थे. कुछ ऐसे भी लोग थे जो अहिंसा के रास्ते पर चलकर देश को आज़ादी दिलाना चाहते थे. उन मे एक महात्मा गाँधी थे ; उनके साथ कम करने वाले श्री विनोबा भावे और पुरुषोत्तम दस टंडन जैसे लोग थे. और जो अहिंसावादी क्रांतिकारी थे उन्होने भी अपना एक घोषणापत्र बनाया था; और उनका घोषणा पात्र 1946 में पूरे देश के सामने आया था. क्रांतिकारियों का घोषणापत्र 1924 में आया और उसके बाद 1946 में अहिंसावादियों का घोषणापत्र सामने आया. दोनों घोषणापत्रों में बहुत सारी समानताएँ हैं. पहला बिंदु उसमें भी यही है हमें संपूर्ण आज़ादी चाहिए, अंग्रेज चाहें तो इस देश में मेहमान बनकर रहें लेकिन अँग्रेजीयत को इस देश से हमें विदा करना है. तीसरा बिन्दु था कि अँग्रेज़ों की बनाई हुई व्यवस्था और सभी क़ानून हमें बदलने हैं; हमें इन की ज़रूरत नही है. चौथा बिन्दु है ग़रीबी, भुखमरी, बेकारी इस देश से दूर होनी चाहिए. इस तरह से एक लंबा घोषणा पात्र अहिंसावादियों की तरफ से आया. ये जो अहिंसावादी और हिंसावादी क्रांतिकारी थे इन्हें मैं कैंची की तरह मानता हूँ. आपको मालूम है कैंची के दो हिस्से होते हैं और दोनों ही काटने का काम करते हैं,इसी तरह हिंसावादी और अहिंसावादी अँग्रेज़ों की गुलामी को काटने का काम कर रहे थे. उद्देश्य में कही कोई मतभेद नही था सपने दोनों के एक ही थे केवल रास्ते और तरीके अलग अलग थे. कुछ क्रांतिकारियों ने अँग्रेज़ों से लड़-भिड कर, मरने और ख़तम करके आज़ादी पाने का रास्ता चुना. कुछ का रास्ता था कि अँग्रेज़ों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करो, विपरीत परीस्थितियाँ निर्माण करके; अँग्रेज़ों को हटाना है स्वतंत्रता को लाना है. उद्देश्य और आदर्शों में कोई मतभेद नही है

                                         ये हमारे समझने की बात है. अगर दोनों ही तरह के क्रांतिकारीयो के उद्देश्य और आदर्श एक थे, तो आज़ादी मिलते ही इस 15 अगस्त 1947 के तुरंत बाद इस देश की संसद और विधानसभाओं को इस काम लिए लग जाना चाहिए था कि शहीदों के जो सपने और आदर्श थे उन्हे कैसे पूरा करें. इस बात पर चर्चा होनी चाहिए थी कि हम ऐसा क्या करें जिससे ये उद्देश्य जल्दी से जल्दी पूरा हो. लेकिंन आज़ादी के 66 साल के बाद भी संसद और विधानसभाओं ने ऐसा कुछ नही किया जिससे शहीदों के एक सपने को भी पूरा किया जा सके.
                                        भारत के युवा नौजवान इन्ही रास्तों पर आते रहें और देश के लिए अपने को खपाते रहें और न्यौछावर करते रहें. जब तक शहीदों के सपनो का भारत नहीं बन जाता स्वदेशी की ओर , स्वाभिमान के साथ --- स्वराज्य की ओर ...

वन्दे मातरम्

जय हिन्द